चार आने का हिसाब-Prerak Prasang Story

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चार आने का हिसाब-Prerak Prasang Story Hindi:बहुत समय पहले की बात है,वीरपुर का राजा बड़ा प्रतापी था।वह पैसों से बड़ा समृद्ध था, समृद्धि की वजह से उसकी दूर दूर तक ख्याति थी।

चार आने का हिसाब-Prerak Prasang Story
चार आने का हिसाब-Prerak Prasang Story

महल में हर एक चीज की सुविधता थी पर फिर भी राजा का मन हमेशा अशांत रहता था।उसने कई विद्ववानों,ज्योतिषों से और न जाने कई पंतिड़तो से इश्का कारन पूछा,कइयों ने यज्ञ करवाने का बोला तो कइयों ने अंगूठियां पहनने के लिए कहा पर यह सब करने के बावजूद राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसको शांत नहीं मिली।

एक दिन राजा अपना भेष बदल कर अपने राज्य के सेर पर निकला।घूमते-घूमते वह एक खेत के नजदीक से गुजर रहा था तब उसको एक किसान दिखाई दिया।उस किसान ने फटे पुराने कपडे पहन रखे थे और एक पेड़ की छाव में बेठ कर अपना दोपहर का भोजन कर रहा था।

राजा को किसान को देख कर दया आ गयी।उसने सोचा की मेरे पास तो काफी धन है,क्यों न में इश्को थोड़ा धन दे कर इशके दुःख दर्द दूर करू।

फिर वह राजा उस किसान के पास जा कर बोला -“में एक राहगीर हु,मे जब तुम्हारे खेत के बगल से गुजर रहा था तब यह सुवर्ण मुद्राये तुम्हारे खेत में मिली और चूंकि यह खेत तुम्हारा है तो यह सुवर्ण मुद्राये तुम्हारी हुयी।”

किसान बोला – “नहीं नहीं सेठ जी।यह मेरी स्वर्ण मुद्राएं नहीं है।इसे आप ही रखे या फिर किसी और को दान कर दीजिए।मुझे इनकी कोई आवस्यकता नहीं है।”

राजा को किसान की यह प्रतिक्रिया बड़ी अजीब लगी।राजा बोला ” अरे,धन की अवश्यकता भला किसको नहीं होती?आप लक्ष्मी को मना कैसे कर सकते हो?

किसान ने उत्तर दिया- “सेठ जी में रोज चार आने कमा लेता हूं और उसी में प्रसन्न हूँ।”

राजा बड़े आश्चर्य से बोले “चार आने।।आप सिर्फ कार आने की कमाई करते है?…और उतने में ही प्रसन्न है।यह क्या संभव है?”

किसान बोला “सेठ जी,प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते है औऱ आपके पास कितम धन है…प्रसन्नता इस बात पर निर्भर करती है कि आप उस पैसे को किस तरह उपयोग करते है।”

राजा ने प्रश्न किया “तो तुम इस चार आने से क्या क्या कर लेते हो?”

किसान को खेतों में काम था इसलिए वह आगे बढ़ते हुये बोला “यह चार आने में से एक में कुवे में डाल देता हूं,दूसरा में उधार में दे देता हूं,तीसरे से कर्ज चूका देता हूं और आखरी वाले को में ज़मीन में गाड़ देता हूं।”

राजा को कुछ समझ नहीं आया।वह उस किसान से पूछना चाहता था पर तब तक वह किसान वहा से जा चूका था।

अगेले दिन राजा ने अपने दरबार में सभा बुलवाई और उस किसान के साथ की वार्तालाप सभी को बताई और सब लोगो से उस किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।

दरबार में बेठे सभी ने अपना अपना तर्क बताया पर राजा को किसी के उत्तर से संतुष्टि नहीं मिली और आखिर कार राजा ने उस किसान को दरबार में पेश होने का आदेश दिया।

अगेले दिन दरबार में उस किसान को पेश किया गया।फिर राजा ने उस दिन भेष बदल कर भ्रमण करने की बात बताई और सम्मान पूर्वक किसान को दरबार में बिठाया।

राजा ने प्रश्न किया “में तुम्हारे उत्तर से प्रसन्न हुआ,औऱ तुम्हारे चार आने का हिसाब भी जानने की इच्छा रखता हूँ।बताओ, तुम अपने चार आने कहा खर्च करते हो जो तुम उस से प्रसन्न और संतुष्ठ रह पाते हो?”

किसान ने उत्तर दिया “हुज़ूर,मेने जैसा कहा था,मे एक आना कुवे में दाल देता हूं इसका मतलब अपने परिवार के भरण पोषण में लगा देता हूँ।दूसरे से मे कर्ज चूका देता हूं,यानि की इस से में अपने माता पिता की सेवा में लगा देता हूँ।तीसरा में उधार दे देता हूँ यानि बचो की शिक्षा में लगा देता हूँ।और चौथा में मिटटी में गाड़ देता हूँ,यानि पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर किसी से उधार ना लेना पड़े,और धार्मिक,सामाजिक अन्य कार्यो में उपयोग कर सकू।

राजा को किसान की सारी बाते समझ में आ चुकी थी।राजा की परेसानी का हल मिल चुका था।वह समझ चूका था कि अगर खुश और सन्तुष्ठ रहना है तो कमाये हुये पैसे का सही सही उपयोग करना जरूरी है।

दोस्तों,देखा जाये तो पहले की तुलना में लोगो की आज की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी की तुलना में हमारी प्रसन्ता भी बढ़ी है?शायद हम पैसों के मामले में कही न कही गलती कर रहे है लाइफ को balanced बनाना बहुत ही जरूरी है और इसके लिए हमे अपनी आमदनी और उस आमदनी के उपयोग पर गोर करना चाहिए।नहीं तो भले हम लाखो करोड़ो क्यों न कमाते हो पर हम कभी सन्तुष्ठ और प्रसन्न नहीं रह पाएंगे।

 

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